विचार

कमरा, बारिश और अधूरी रात

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कमरा, बारिश और अधूरी रात




मुंबई की उस रात आसमान से पानी नहीं, जैसे कोई पुराना ग़ुबार बरस रहा था। सुमित के फ्लैट की कांच की बड़ी खिड़की पर गिरती बूंदों की आवाज़ पूरे सन्नाटे को चीर रही थी। कमरे में सिर्फ एक कोने में जल रहा मद्धम पीला लैंप ही रोशनी का इकलौता जरिया था, जिससे दीवारों पर परछाइयां लंबी और गहरी दिख रही थीं।
अनाया सोफे पर बैठी थी। उसके हाथ में वाइन का ग्लास था, लेकिन उसका पूरा ध्यान खिड़की से बाहर रेंगती गाड़ियों की हेडलाइट्स पर था। उसने नीले रंग की सिल्क की वन-पीस ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके बदन पर इतनी कसी हुई थी कि उसकी हर सांस के साथ उसका सीना ऊपर-नीचे होता साफ दिख रहा था।
सुमित अपनी शर्ट के कफ्स को खोलता हुआ उसके करीब आया। उसने अनाया के हाथ से ग्लास लिया और उसे बगल की टेबल पर रख दिया। कमरे में अब सिर्फ उनकी सांसों की आवाज़ और बारिश का शोर था।
"तुम बहुत शांत हो आज," सुमित ने बहुत ही धीमी, भारी आवाज़ में कहा। वह अनाया के इतने करीब आ चुका था कि अनाया को उसकी सांसों की गर्माहट अपनी गर्दन पर महसूस होने लगी।
अनाया ने सिर उठाकर सीधे सुमित की आँखों में देखा। उन आँखों में वो सब कुछ था जो पिछले छह महीनों से दोनों एक-दूसरे से छुपाने की कोशिश कर रहे थे—एक बेकाबू कर देने वाली तड़प। "शांत नहीं हूँ सुमित... बस डर रही हूँ कि अगर आज ये हदें टूट गईं, तो हम कभी वापस नहीं लौट पाएंगे।"
सुमित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना भारी हाथ आगे बढ़ाया और उसकी उंगलियां अनाया के गालों को सहलाती हुई उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर टिक गईं। सुमित की उंगलियों की छुअन इतनी गर्म थी कि अनाया के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और एक ठंडी सांस ली।
सुमित थोड़ा और झुका। उसके होंठ अनाया के कान के पास आए, "तो मत लौटकर जाओ..."
इस एक जुमले के साथ ही कमरे की बची-खुची औपचारिकता भी पिघल गई। सुमित के होंठ अनाया की गर्दन के नाजुक हिस्से पर उतरे। अनाया के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली—"आह..." उसने अनजाने में सुमित के कंधों को अपनी उंगलियों से कसकर जकड़ लिया। सुमित की दाढ़ी की हल्की रगड़ जब अनाया की कॉलरबोन पर लगी, तो उसकी सांसें पूरी तरह उखड़ गईं।
सुमित ने अनाया को सोफे से अपनी मजबूत बाहों में उठा लिया। सिल्क की ड्रेस सुमित के हाथों की रगड़ से थोड़ी ऊपर खिसक गई थी, जिससे अनाया के पैर पूरी तरह बेपर्दा हो चुके थे। उसने अनाया को बेडरूम के बड़े, मखमली बिस्तर पर धीरे से लिटाया। बिस्तर की ठंडी चादर जब अनाया की नंगी पीठ से छुई, तो वह एक पल के लिए कांप उठी, लेकिन अगले ही पल सुमित का भारी जिस्म उसके ऊपर झुक आया।
"सुमित... धीरे..." अनाया ने सुमित के सीने पर हाथ रखकर उसे रोकने की एक नाकाम कोशिश की। उसकी आवाज़ में अब कोई पाबंदी नहीं थी, सिर्फ एक मदहोश कर देने वाली गुजारिश थी।
"अब और धीरे नहीं हो सकता, अनाया," सुमित ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आँखें इस वक्त गहरी और लगभग काली हो चुकी थीं, जहाँ सिर्फ एक जंगली चाहत साफ दिख रही थी।
सुमित के हाथों ने अनाया की ड्रेस की ज़िप को धीरे-धीरे नीचे सरकाया। सरकते हुए कपड़े की सरसराहट कमरे के सन्नाटे में साफ सुनी जा सकती थी। जैसे ही कपड़ा उसके कंधों से नीचे उतरा, चाँद की मद्धम रोशनी में अनाया का पूरा बदन सुमित के सामने था। सुमित के होंठ अब और नहीं रुके। उसने अनाया के होठों को अपने शिकंजे में ले लिया। यह चुंबन धीमा नहीं था; इसमें महीनों की प्यास, गुस्सा और बेबसी सब एक साथ शामिल थे।
अनाया का हाथ सुमित के बालों में उलझ गया। वह सुमित को खुद में और गहराई से समेटने लगी। सुमित के हाथ अनाया की कमर पर कसते जा रहे थे, जिससे वहाँ उंगलियों के लाल निशान उभर आए थे। कमरे का तापमान जैसे हर सेकंड के साथ बढ़ रहा था। दोनों के जिस्मों से निकलने वाली गर्मी ने एसी की ठंडक को पूरी तरह नाकाम कर दिया था।
बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी, और कमरे के अंदर दो ज़िंदगियां अपनी सारी बंदिशें तोड़कर एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन हो रही थीं। यह रात किसी वादे की मोहताज नहीं थी, यह सिर्फ उस एक पल की हकीकत थी जिसे दोनों अपनी आखिरी सांस तक नहीं भूलने वाले थे।


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