विचार

विचार

<<-Please translate in your language->>

विचार 

रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और बादलों की गड़गड़ाहट के साथ ठंडी हवाएं खिड़की के शीशों से टकरा रही थीं। राघव अपने स्टडी रूम में बैठा हुआ था। टेबल लैंप की मद्धम पीली रोशनी में वह लैपटॉप पर ऑफिस की एक बेहद ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन आख़िरी रूप दे रहा था। हवा के झोंकों से जब कमरे का पर्दा तेजी से लहराया, तो राघव की एकाग्रता टूटी। उसने घड़ी की तरफ देखा और एक ठंडी सांस ली। दिनभर की थकान अब उसकी आंखों में साफ नजर आने लगी थी।

उसने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी थकी हुई आँखों को उंगलियों से सहलाया। तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई। राघव ने मुड़कर देखा। दरवाजे के सहारे मीरा खड़ी थी। उसने गहरे महरून रंग की सिल्क की नाइटी पहनी हुई थी, जो उसके शरीर पर पूरी तरह जंच रही थी। उसके बाल अभी-अभी धुले हुए लग रहे थे, जिनसे मोगरे और चमेली के तेल की भीनी-भीनी खुशबू पूरे कमरे में तैरने लगी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव और एक छुपी हुई शरारत थी।

"क्या तुम्हारी यह ऑफिस की फाइलें कभी खत्म होंगी, राघव?" मीरा ने बेहद धीमी और मखमली आवाज में कहा। उसकी आवाज में एक ऐसी कशिश थी जिसने राघव के दिमाग की सारी थकान को पल भर में गायब कर दिया।

राघव ने मुस्कुराते हुए लैपटॉप की स्क्रीन को आधा झुका दिया। "बस थोड़ा सा काम और बचा है, मीरा। यह कल सुबह सबमिट करना है।"


मीरा धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई राघव के पास आई। उसकी पायल की हल्की छनक इस शांत रात में बेहद जादुई लग रही थी। वह राघव की कुर्सी के पीछे खड़ी हो गई और अपने दोनों कोमल हाथ उसके कंधों पर रख दिए। उसने धीरे-धीरे राघव के कंधों की मालिश करनी शुरू कर दी। उसके हाथों का वह जादुई स्पर्श राघव के शरीर में एक नई ऊर्जा भर रहा था। राघव ने अपनी आँखें बंद कर लीं और पूरी तरह उस अहसास में डूब गया।

तभी मीरा थोड़ा और आगे झुकी। उसकी सांसों की गर्माहट राघव के कानों और गर्दन पर महसूस हो रही थी। उसने राघव के कान के पास धीरे से फुसफुसाया, "काम तो पूरी जिंदगी चलता रहेगा। लेकिन यह ठंडी बारिश, यह हसीन मौसम और हम... यह पल दोबारा नहीं आएगा।"

राघव से अब और रुका नहीं गया। उसने लैपटॉप को पूरी तरह बंद किया और उसे एक तरफ सरका दिया। उसने मुड़कर मीरा का हाथ पकड़ा और एक झटके में उसे अपनी गोद में खींच लिया। मीरा अप्रत्याशित रूप से सीधे राघव की गोद में आ गिरी। उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली दौड़ गई। दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं। कमरे के भीतर का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था। बाहर की ठंडी हवा का अब उन पर कोई असर नहीं हो रहा था।

राघव ने मीरा के चेहरे पर बिखरी हुई बालों की एक गीली लट को बहुत ही नजाकत से अपनी उंगलियों से हटाया और उसे उसके कान के पीछे कर दिया। उसका हाथ वहीं नहीं रुका; वह धीरे से नीचे उतरा और मीरा के गालों को छूते हुए उसकी गर्दन तक गया। मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसकी सांसें तेज होने लगीं। उसने राघव के मजबूत कंधों को कसकर थाम लिया।

"तुम आज बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही हो, मीरा। इतनी कि मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता," राघव ने उसकी आंखों में गहराई से देखते हुए कहा।

मीरा ने शर्माते हुए अपनी नजरें झुका लीं और अपना सिर राघव के सीने पर रख दिया। जहाँ राघव के दिल की धड़कनें साफ सुनी जा सकती थीं, जो इस समय काफी तेज चल रही थीं। राघव ने उसे अपनी बाहों के घेरे में और कस लिया। उस पल में, दोनों को लगा कि पूरी दुनिया जैसे ठहर गई है। न तो ऑफिस की कोई चिंता थी, न कल सुबह की कोई जल्दी।

काफी देर तक दोनों उसी अवस्था में बैठे रहे, बस खिड़की से गिरती बारिश की बूंदों की आवाज को सुनते हुए। राघव ने मीरा को अपनी बाहों में उठाया और बेडरूम की तरफ बढ़ गया। बेडरूम में सिर्फ एक छोटा सा नाइट लैंप जल रहा था, जिसकी रोशनी कमरे में एक रोमान्टिक और शांत माहौल बना रही थी।

राघव ने मीरा को धीरे से बेड पर लेटाया और खुद उसके बगल में लेट गया। उसने एक बड़ा सा मखमली कंबल दोनों के ऊपर डाल दिया। मीरा तुरंत राघव के और करीब सरक आई और अपना एक हाथ उसकी छाती पर रख दिया। राघव ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसकी उंगलियों से खेलने लगा।

"राघव," मीरा ने बेहद धीमी आवाज में कहा।

"हूँ..." राघव ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया।

"तुम्हें याद है, जब हमारी शादी के शुरुआती दिन थे, तब भी ऐसी ही एक बारिश की रात थी?" मीरा ने मुस्कुराते हुए पुरानी यादों का सिरा पकड़ा।

"हाँ, मुझे बिल्कुल याद है," राघव के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान आ गई। "तुम उस दिन किचन में पकौड़े बना रही थीं और पहली बार बिजली चली गई थी। तुम डरकर सीधे मुझसे लिपट गई थीं।"

"मैं डरी नहीं थी, मैं तो बस तुम्हारे पास आने का बहाना ढूंढ रही थी," मीरा ने हंसते हुए सच कबूल किया।

इस बात पर दोनों हल्के से हंस पड़े। वह हंसी उनके बीच के गहरे जुड़ाव और सालों के उस अटूट विश्वास को बयां कर रही थी जो उन्होंने एक-दूसरे के साथ कमाया था। वक्त बीतता गया, रात और गहरी होती गई। बाहर की बारिश अब धीमी हो चुकी थी, लेकिन मौसम की वो ठंडक अभी भी बरकरार थी।

राघव ने मीरा के माथे पर अपना पहला और सबसे गहरा चुंबन अंकित किया। उस स्पर्श में वासना की जगह एक अगाध सम्मान, सुरक्षा का अहसास और निश्छल प्रेम था। मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी, सुकून भरी सांस ली।

धीरे-धीरे, दोनों एक-दूसरे की बाहों के सुकून में खोने लगे। कमरे की वो मद्धम रोशनी और बाहर की शांत होती बारिश गवाह थी उनके इस अटूट रिश्ते की। सुबह की पहली किरण फूटने से ठीक पहले, दोनों एक बेहद खूबसूरत और गहरी नींद के आगोश में सो चुके थे, जहाँ सिर्फ उनका प्यार और आने वाले कल के हसीन सपने थे।

------------------------------


टिप्पणियाँ