विचार

बारिश और पुरानी यादें


अजनबी शहर की शाम

मुंबई की बारिश कभी भी बिना चेतावनी के आ जाती थी। काव्या ने कैफ़े की कांच की खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर गाड़ियां रेंग रही थीं। पानी की बूंदें शीशे पर फिसल रही थीं। ठीक वैसे ही, जैसे उसकी जिंदगी से सारे पुराने रिश्ते फिसल चुके थे।
वह यहाँ एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में सीनियर क्रिएटिव डायरेक्टर बनकर आई थी। दिल्ली से मुंबई का सफर सिर्फ शहरों का बदलाव नहीं था। यह उसके लिए अपनी पुरानी जिंदगी और एक टूटे हुए रिश्ते से भागने की कोशिश थी।
उसने अपनी ब्लैक कॉफ़ी का एक घूंट लिया। कड़वाहट उसके गले से नीचे उतर गई। लेकिन दिल की कड़वाहट वैसी ही बनी रही।

एक अप्रत्याशित मुलाकात
कैफ़े का दरवाज़ा खुला। ठंडी हवा के झोंके के साथ एक शख्स अंदर आया। उसने अपनी भीगी हुई लेदर जैकेट उतारी और बालों को झटका। काव्या की नजर उस पर पड़ी। उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
वह कबीर था। {इसके साथ वह राते बिता देती थी|}
वही कबीर, जिसे वह पाँच साल पहले कॉलेज के आखिरी दिन छोड़ आई थी। कोई अलविदा नहीं। कोई वादा नहीं। बस एक खामोश जुदाई। इन पाँच सालों में वह लड़का अब एक परिपक्व, बेहद आकर्षक पुरुष बन चुका था। उसकी चौड़ी छाती, हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी और वही गहरी आंखें, जिनमें कभी काव्या खो जाया करती थी।
कबीर ने कैफ़े में नजर दौड़ाई। उसकी आंखें काव्या पर आकर टिक गईं, {काव्या के स्तन अब ओर बड़े हो चुके थे}। कुछ पलों के लिए दोनों के बीच का समय जैसे ठहर गया।

पुरानी चिंगारी
कबीर कदम बढ़ाता हुआ उसकी टेबल के पास आया। उसके चेहरे पर एक अधूरी मुस्कान थी।
"काव्या? तुम यहाँ?" कबीर की आवाज अब भारी और गहरी हो चुकी थी। उस आवाज ने काव्या के पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर दी।
"कबीर... हाय।" काव्या ने अपनी घबराहट छुपाते हुए कहा। "बैठो न।"
कबीर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। दोनों के बीच एक असहज करने वाली खामोशी छा गई। लेकिन दोनों की आंखें बहुत कुछ कह रही थीं। काव्या ने ध्यान दिया कि कबीर की उंगलियां टेबल पर पड़ी उसकी उंगलियों के बेहद करीब थीं। वह उस छुअन की गर्मी को महसूस कर सकती थी।
"सुना है तुम दिल्ली शिफ्ट हो गई थीं?" कबीर ने पूछा। उसकी नजरें काव्या के होठों पर टिक गई थीं।
"हाँ, पर अब मुंबई वापस आ गई हूँ। जॉब के सिलसिले में।" काव्या ने अपने बालों की एक लट को कान के पीछे करते हुए कहा। इस हरकत से उसकी गर्दन का वह हिस्सा दिखने लगा, जहाँ कबीर कभी अपने होंठ रख दिया करता था।

दबी हुई इच्छाएं
जैसे-जैसे शाम ढलती गई, बातें गहरी होती गईं। पुरानी शिकायतें अब एक अजीब से आकर्षण में बदल रही थीं। कॉफ़ी के बाद उन्होंने वाइन का ऑर्डर दिया। शराब के असर ने उनके बीच की झिझक को कम कर दिया था।
"तुमने कभी मुझे ढूँढने की कोशिश नहीं की?" कबीर ने सीधे काव्या की आँखों में देखते हुए पूछा। उसकी आवाज में एक अजीब सा अधिकार था।
"डरती थी कबीर। तुम्हारे गुस्से से... और खुद से भी।" काव्या ने सच स्वीकार किया।
कबीर ने टेबल पर हाथ आगे बढ़ाया और काव्या का हाथ थाम लिया। उसकी हथेलियों की गर्मी से काव्या के अंदर एक करंट सा दौड़ गया। कबीर का अंगूठा काव्या की कलाई पर धीरे-धीरे रगड़ रहा था, जिससे उसकी दिल की धड़कनें तेज हो गईं।
"मैं आज भी तुमसे उतना ही नफरत करता हूँ काव्या... और शायद उतना ही..." कबीर रुक गया। उसकी आंखों में एक गहरी चाहत और तड़प साफ दिख रही थी।
रात का सन्नाटा
कैफ़े बंद होने का समय हो चुका था। बाहर बारिश अब भी थमी नहीं थी। कबीर ने काव्या को अपनी कार से ड्राप करने का ऑफर दिया।
कार के अंदर का माहौल और भी ज्यादा मदहोश करने वाला था। परफ्यूम की खुशबू, धीमी म्यूजिक और बाहर गिरता पानी। जब कार काव्या के अपार्टमेंट के सामने रुकी, तो दोनों में से कोई भी कार से उतरना नहीं चाहता था।
"ऊपर आओगे? एक और ड्रिंक के लिए?" काव्या ने हिम्मत जुटाकर पूछा। उसकी आवाज में एक अनकही दावत थी।
कबीर ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें गहरी और काली हो चुकी थीं, जो इस बात का संकेत थीं कि उसके अंदर की इच्छाएं अब काबू से बाहर हो रही थीं।
"तुम्हें यकीन है काव्या? क्योंकि अगर मैं आज ऊपर आया, तो मैं पुराना हिसाब पूरा किए बिना वापस नहीं जाऊंगा।" कबीर ने धीमी और मादक आवाज में कहा।
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस कबीर की आँखों में देखा और कार का दरवाज़ा खोल दिया। कबीर ने कार पार्क की और उसके पीछे हो लिया। इस बात से दोनों वाकिफ थे कि आज की रात उनके जीवन को हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
{इस प्रकार दोनों फिर से मिल जाते है और अपनी अधूरी इच्छा पूरी करते हैं}



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